
तुर्कमेनिस्तान के काराकुम रेगिस्तान में एक जगह है जिसे लोग “गेटवे टू हेल” यानी नरक का दरवाजा कहते हैं। यहां पिछले पांच दशकों से आग धधक रही है — और ये कोई प्राकृतिक ज्वालामुखी नहीं, बल्कि इंसानी गलती से शुरू हुई एक अनोखी घटना है।
🧪 1971 में हुई एक छोटी सी गलती…
सब कुछ शुरू हुआ साल 1971 में, जब सोवियत वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में गैस की खोज के लिए खुदाई शुरू की। लेकिन जैसे ही ड्रिलिंग मशीन ने एक बड़े भूमिगत गैस भंडार को छेड़ा, जमीन अचानक धंस गई और वहां एक बड़ा गड्ढा बन गया।
इसके बाद गैस इतनी तेजी से बाहर निकलने लगी कि वैज्ञानिकों ने सोचा — इसे आग लगाकर खत्म कर देंगे, और यह कुछ हफ्तों में जलकर खत्म हो जाएगी। लेकिन हुआ उल्टा — गैस खत्म होने की बजाय लगातार निकलती रही, और आग पचास सालों से भी ज़्यादा वक्त से धधक रही है।
🌋 दृश्य ऐसा जैसे धरती फट गई हो
ये जलता हुआ गड्ढा धीरे-धीरे एक टूरिस्ट अट्रैक्शन बन गया। रात के समय इसकी लपटें आसमान को छूती हैं और दूर से देखने पर लगता है मानो कोई ज्वालामुखी फट पड़ा हो। सैकड़ों लोग हर साल इसे देखने पहुंचते हैं।
🌍 पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा
ये जलती हुई गैस केवल एक अजूबा नहीं, बल्कि क्लाइमेट चेंज के लिए भी गंभीर समस्या है। यहां से निकलने वाली गैसों में मीथेन प्रमुख है, जो वातावरण को कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना ज्यादा नुकसान पहुंचाता है।
IEA (International Energy Agency) के अनुसार, इसी कारण तुर्कमेनिस्तान को दुनिया में सबसे ज़्यादा मीथेन उत्सर्जन करने वाले देशों में गिना जाने लगा है।
🔧 आखिरकार आग बुझाने की कोशिशें
अब सरकार ने इसे बुझाने के लिए नई तकनीकें अपनानी शुरू कर दी हैं। गैस पकड़ने के लिए आसपास नए कुएं खोदे जा रहे हैं। अधिकारियों का दावा है कि अब यह लपटें बहुत कम हो गई हैं, और जल्द ही इसे पूरी तरह बुझा दिया जाएगा।
🏁 निष्कर्ष: एक चेतावनी और एक सबक
नरक का यह दरवाजा सिर्फ एक जलती हुई जगह नहीं, बल्कि यह याद दिलाता है कि प्रकृति से खिलवाड़ या तकनीकी लापरवाही किस हद तक असर डाल सकती है। यह घटना हमें वातावरण के प्रति सचेत रहने, और सतत विकास की ओर बढ़ने की जरूरत भी बताती है।