
75 वर्षों में भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन पश्चिमी देशों के पुराने अनुभवों को देखते हुए, वह कश्मीर मुद्दे पर बाहरी दखल को स्वीकार नहीं करता।
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार यह दावा कर चुके हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थता की पेशकश की थी। उनका कहना था कि अमेरिका ऐसे देशों के साथ व्यापार नहीं करेगा, जो आपस में युद्ध की स्थिति में हों। हालांकि भारत ने इस प्रस्ताव को बार-बार सिरे से खारिज किया और स्पष्ट किया कि कश्मीर से जुड़ी हर चर्चा द्विपक्षीय होगी।
इतिहास से सबक: 1948 में कश्मीर पर पहली बड़ी चुनौती
पाकिस्तान ने भारत के विभाजन के कुछ ही महीनों बाद जम्मू-कश्मीर पर हमला किया। तब भारत ने संयुक्त राष्ट्र का रुख किया, यह सोचकर कि दुनिया न्याय का पक्ष लेगी। लेकिन ब्रिटेन और अमेरिका की भूमिका संतुलित न होकर झुकाव लिए हुए प्रतीत हुई, जिसने भारत के नजरिए से भरोसे की नींव कमजोर की।
इतिहासकारों के अनुसार, जब संयुक्त राष्ट्र में बहस हुई, तो मुद्दा 'भारत-पाकिस्तान विवाद' के रूप में सामने लाया गया, जबकि भारत चाहता था कि इसे 'पाकिस्तानी आक्रमण' माना जाए। इससे भारत को यह अनुभव हुआ कि बाहरी हस्तक्षेप अकसर निष्पक्ष नहीं होता।
शीत युद्ध के दौर में पाकिस्तान की भूमिका
शीत युद्ध के समय अमेरिका ने सोवियत संघ के खिलाफ रणनीतिक लाभ के लिए पाकिस्तान को एक प्रमुख सहयोगी बनाया। इसी दौरान पाकिस्तान में आतंकी संगठनों को खड़ा किया गया। अमेरिका ने सैन्य और आर्थिक मदद के रूप में अरबों डॉलर पाकिस्तान को दिए, जिससे वह अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बना सके। वहीं भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई और स्वतंत्र विदेश नीति पर ज़ोर दिया।
9/11 के बाद का दौर
9/11 के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध शुरू किया और एक बार फिर पाकिस्तान को सहयोगी बना लिया। इसके बदले में पाकिस्तान को अत्याधुनिक हथियार, वित्तीय मदद और राजनीतिक समर्थन मिला, जबकि भारत ने अपनी आत्मनिर्भर सुरक्षा नीति और आर्थिक शक्ति से खुद को दुनिया में स्थापित किया।
भारत-चीन युद्ध (1962) और अमेरिका की भूमिका
1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत को सैन्य सहायता दी, लेकिन साथ ही यह भी प्रयास किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मुद्दे पर कोई समाधान निकले। हालांकि इस दबाव का कोई खास नतीजा नहीं निकला, लेकिन अमेरिका ने पाकिस्तान को युद्ध से दूर रहने की स्पष्ट चेतावनी जरूर दी।
1971: बांग्लादेश युद्ध और अमेरिकी रुख
भारत-पाक युद्ध के दौरान अमेरिका ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया और यहां तक कि अपना युद्धपोत बंगाल की खाड़ी में भेजा। हालांकि तब के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यह कदम ज्यादा असरकारी साबित नहीं हुआ। भारत की निर्णायक जीत ने अमेरिकी नीति को झटका दिया।
कारगिल युद्ध: नया मोड़
1999 के कारगिल संघर्ष में अमेरिका का रुख भारत के पक्ष में रहा। राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान को स्पष्ट संकेत दिया कि नियंत्रण रेखा के उल्लंघन को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसका असर यह हुआ कि पाकिस्तान को कदम पीछे खींचने पड़े और भारत की कूटनीति को समर्थन मिला।
निष्कर्ष
भारत आज उस मुकाम पर है जहां वह अंतरराष्ट्रीय मामलों में आत्मनिर्भर और निर्णायक भूमिका निभा रहा है। कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भारत का रुख स्पष्ट और सख्त है — किसी तीसरे पक्ष की भूमिका की कोई आवश्यकता नहीं। बीते अनुभवों से सबक लेते हुए, भारत अब अपनी विदेश नीति को पूरी तरह अपने हितों के अनुसार संचालित करता है।