SIR पर गरमाई सियासत: संजय राउत बोले – “महाराष्ट्र में जो हुआ, वही अब बिहार में हो रहा है”, चुनाव हाईजैक की कोशिश

बिहार में विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर राजनीतिक घमासान तेज़ हो गया है। विपक्षी दल इस प्रक्रिया को “संदिग्ध” और “बीजेपी प्रायोजित” बता रहे हैं। इसी बीच शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग दोनों पर तीखा हमला बोला है।

मुंबई के भांडुप में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए संजय राउत ने कहा कि, “बिहार का चुनाव हाईजैक करने की कोशिश हो रही है, जैसा कि महाराष्ट्र में हुआ था। लेकिन याद रखिए, इससे क्रांति होगी, क्योंकि बिहार और महाराष्ट्र दोनों क्रांति की भूमि हैं।


❗ क्या है SIR और क्यों मचा है बवाल?

SIR यानी ‘Special Intensive Revision’ – चुनाव आयोग की एक प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूची को अपडेट करने, नए मतदाताओं को जोड़ने और मृत या स्थानांतरित लोगों के नाम हटाने का काम किया जाता है।

इस बार SIR को लेकर विवाद इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि आरोप लगाए जा रहे हैं कि:

  • बड़ी संख्या में वैध भारतीय नागरिकों को सिर्फ दस्तावेज़ी तकनीकी कारणों से मतदाता सूची से बाहर किया जा रहा है

  • जिन लोगों के पास नागरिकता के प्रमाण नहीं हैं, उन्हें सूची से हटाने की कोशिश की जा रही है

  • यह प्रक्रिया बीजेपी के इशारे पर की जा रही है ताकि चुनावों में उसे फायदा हो सके।


🗣️ संजय राउत ने क्या कहा?

संजय राउत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि, “यह सिर्फ एक पुनरीक्षण नहीं, बल्कि बिहार चुनाव को हाईजैक करने की योजना है। महाराष्ट्र में भी ऐसा ही किया गया था, और अब उसी मॉडल को बिहार में लागू किया जा रहा है।

उनका आरोप है कि बीजेपी और चुनाव आयोग अब अलग-अलग संस्थान नहीं हैं, बल्कि एक ही संगठन की तरह काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा:

“चुनाव आयोग और बीजेपी हाथ में हाथ मिलाकर काम कर रहे हैं। अब चुनाव आयोग भारत का नहीं रहा, वो बीजेपी का एक्सटेंडेड ऑफिस बन गया है। जहां से जो बीजेपी चाहती है, वो हो जाता है।”


🔥 “बिहार में क्रांति होगी”

राउत ने कहा कि बिहार क्रांति की ज़मीन है और अगर वहां के लोगों के वोटिंग अधिकार छीने गए, तो जनता चुप नहीं बैठेगी। उन्होंने याद दिलाया कि जेपी आंदोलन, समाजवाद की लड़ाई और राजनीतिक परिवर्तन की जड़ें बिहार से ही निकलती रही हैं।

“जब-जब देश में क्रांति हुई है, दो ही राज्यों से हुई है — बिहार और महाराष्ट्र। अगर आप इन राज्यों में लोकतंत्र को कुचलने की कोशिश करेंगे, तो जनता जवाब देगी।”


🗳️ विपक्ष की एकजुटता पर क्या बोले राउत?

संजय राउत ने बताया कि विपक्षी गठबंधन इंडिया अलायंस (I.N.D.I.A) की अगली बैठक 19 जुलाई को होगी, जिसमें उद्धव ठाकरे हिस्सा ले सकते हैं। राउत ने कहा कि उन्हें कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल का फोन आया था और बैठक में शामिल होने का न्योता दिया गया।

“मैंने कहा है कि उद्धव जी जा सकते हैं। यह बैठक लोकतंत्र की रक्षा और चुनावी रणनीति पर केंद्रित होगी।”


🧾 चुनाव आयोग का पक्ष

विपक्ष के आरोपों के बीच मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने SIR प्रक्रिया की सराहना की और कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र की बुनियाद है। उन्होंने कहा:

  • 7.9 करोड़ मतदाताओं में से सिर्फ 6.85% लोगों ने ही गणना फॉर्म नहीं भरा है।

  • शेष अधिकांश लोगों ने प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी दिखाई है।

  • यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के अनुसार हो रही है।


⚖️ क्या है असली चिंता?

विपक्षी दलों की मुख्य चिंता यह है कि:

  • भारत में आज भी कई गरीब, ग्रामीण और हाशिए पर खड़े समुदायों के पास पर्याप्त कागज़ात नहीं होते हैं।

  • अगर दस्तावेज़ के आधार पर मतदाता हटाए गए, तो यह वंचित तबकों को लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने जैसा होगा।

  • साथ ही, यह आरोप भी है कि चुनाव आयोग अब सत्ता पक्ष के दबाव में काम कर रहा है, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।


⚠️ पत्रकार पर एफआईआर?

संजय राउत ने यह भी कहा कि एक पत्रकार ने चुनाव आयोग की खामियों को उजागर किया था, लेकिन उस पर एफआईआर दर्ज कर दी गई। उन्होंने कहा:

“अगर किसी पत्रकार ने गड़बड़ी दिखाई, तो उसे सुधारना चाहिए था, न कि उसके खिलाफ मामला दर्ज करना। यह लोकतंत्र की हत्या है।”


✍️ निष्कर्ष

बिहार चुनाव को लेकर SIR प्रक्रिया अब सिर्फ एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह बड़े राजनीतिक विवाद और वैचारिक टकराव का कारण बन चुकी है। जहां एक ओर चुनाव आयोग इसे सामान्य प्रक्रिया बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे चुनाव को नियंत्रित करने की साजिश मान रहा है।

संजय राउत के बयान ने इस बहस को और गर्मा दिया है। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में चुनाव आयोग पारदर्शिता साबित कर पाता है या नहीं, और क्या बिहार की जनता सच में कोई “क्रांति” की तैयारी में है?

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