
हाल ही के महीनों में कुछ ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ महिलाओं पर अपने पतियों की हत्या का आरोप लगा। इन मामलों ने केवल सनसनी नहीं फैलाई, बल्कि उस सोच को भी झकझोर कर रख दिया, जिसमें ‘अपराध’ को आमतौर पर पुरुषों से जोड़ा जाता है।
छोटे शहरों से आई सोनम, मुस्कान, शिवानी, रवीना और राधिका जैसी महिलाओं की कहानियों ने सवाल खड़े किए:
क्या महिलाएं अपराध कर सकती हैं?
और अगर करती हैं, तो क्या उन्हें भी वैसा ही देखा जाता है जैसा पुरुष अपराधियों को?
विशेषज्ञ मानते हैं कि महिलाओं के अपराध करने पर समाज उसे एक “दोगुना विचलन” (Double Deviance) के रूप में देखता है — मतलब न केवल उन्होंने कानून तोड़ा, बल्कि सामाजिक ‘नारी’ की छवि को भी तोड़ा।
जब महिला करती है हत्या, समाज क्यों चौंकता है?
दिल्ली नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति और अपराधशास्त्री डॉ. जी. एस. बाजपेयी कहते हैं कि जब कोई महिला अपराध करती है, तो वह दो नियमों का उल्लंघन करती है — कानून का और सामाजिक-लैंगिक भूमिका का।
“महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे कोमल, सहनशील और आज्ञाकारी हों। इसलिए जब वे हत्या जैसा जघन्य अपराध करती हैं, तो समाज उस पर दोहरा न्याय करता है — अपराधी भी और ‘असामान्य महिला’ भी।”
उदाहरण जिन्होंने समाज को चौंकाया
सोनम रघुवंशी: पति के साथ हनीमून पर गई इंदौर की सोनम ने कथित रूप से अपने पूर्व प्रेमी और अन्य लोगों के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी।
मुस्कान रस्तोगी (मेरठ): अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति को चाकू मारकर हत्या की, शव को ड्रम में डालकर सीमेंट में छिपा दिया गया।
शिवानी (बिजनौर): पहले दिल का दौरा बताया, बाद में पुलिस ने हत्या की पुष्टि की।
रवीना (भिवानी): यूट्यूबर रवीना ने एक दोस्त की मदद से पति की हत्या की, क्योंकि पति को उसकी सोशल मीडिया गतिविधियों से ऐतराज था।
राधिका (सांगली): शादी के सिर्फ 15 दिन बाद ही पति की हत्या का आरोप।
इंद्राणी मुखर्जी: मीडिया क्षेत्र से जुड़ी इस महिला पर अपनी ही बेटी की हत्या का आरोप है।
जॉली जोसेफ (केरल): 14 वर्षों में 6 लोगों की हत्या करने की आरोपी, संपत्ति के लालच में जहर देकर मार डाला।
त्रोलोक्य देवी (कोलकाता, 19वीं सदी): भारत की पहली ज्ञात महिला सीरियल किलर, जो गहनों के लालच में यौनकर्मियों की हत्या करती थी।
सोशल मीडिया और मीडिया ट्रायल
इन घटनाओं ने सोशल मीडिया पर नकारात्मक और स्त्री-विरोधी टिप्पणियों को जन्म दिया है। उदाहरण के लिए, ‘सोनम बेवफा है’ जैसे मीम्स वायरल हुए।
महिला अधिकार कार्यकर्ता योगिता भयाना कहती हैं, “जब महिलाएं पारंपरिक भूमिकाओं से बाहर निकलती हैं, तो समाज असहज हो जाता है। मीडिया इन मामलों को सनसनी बनाकर पेश करता है, जिससे वास्तविक मुद्दे दब जाते हैं।”
महिलाओं के अपराधों का कोई अलग डेटा नहीं?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) महिलाओं द्वारा किए गए अपराधों की अलग से गणना नहीं करता, क्योंकि इनकी संख्या तुलनात्मक रूप से कम होती है। फिर भी, जब महिलाएं गंभीर अपराध करती हैं, तो वो समाज की सोच पर गहरा असर डालती हैं।
मनोवैज्ञानिक पहलू: ऐसा क्यों हो रहा है?
आपराधिक मनोवैज्ञानिक दीप्ति पुराणिक बताती हैं कि ये घटनाएं सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक दबावों की परिणति हो सकती हैं।
जल्दी उम्र में शादी
जबरन रिश्ते
संचार की कमी
अवास्तविक उम्मीदें
यह सब मिलकर असंतुलन और कभी-कभी विस्फोट का रूप ले लेता है। भयाना भी इस विचार से सहमत हैं कि महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक दबावों की अक्सर अनदेखी होती है।
निष्कर्ष
महिलाओं द्वारा किए गए अपराध हमारे समाज की उन परंपरागत धारणाओं को चुनौती देते हैं, जो महिलाओं को सिर्फ “पीड़िता” या “माँ” की भूमिका में देखती है।
जब महिलाएं कानून तोड़ती हैं, तो समाज न केवल उनके अपराध को देखता है, बल्कि उनके “औरत” होने को भी कसौटी पर रखता है। यही कारण है कि उन्हें अक्सर “दोगुना दोषी” माना जाता है।