
एक अहम कानूनी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए विचार किया है कि क्या कोई वकील, जो किसी व्यक्ति को केवल कानूनी सलाह दे रहा है, उसे भी पुलिस जांच का सामना करना पड़ सकता है।
गुजरात के एक वकील को एक मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 179 के तहत पुलिस समन भेजा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस समन पर अस्थायी रोक लगाई है और इस विषय को व्यापक कानूनी महत्व वाला मानते हुए संबंधित पक्षों से राय मांगी है।
🔍 मामले की पृष्ठभूमि क्या है?
गुजरात में एक वकील ने एक व्यक्ति को बैंक लोन मामले में जमानत दिलाने में मदद की थी। इसके बाद अहमदाबाद पुलिस ने वकील को समन भेजते हुए कहा कि उन्हें मामले में पूछताछ के लिए बुलाया जा रहा है।
पुलिस का तर्क था कि वकील की भूमिका सिर्फ कानूनी मदद से अधिक हो सकती है। लेकिन वकील ने इसका विरोध करते हुए इसे पेशेवर गोपनीयता का उल्लंघन बताया।
👨⚖️ सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ — जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह — ने कहा कि:
“वकील और मुवक्किल के बीच की बातचीत संवेदनशील और गोपनीय होती है। अगर केवल कानूनी सलाह देने पर भी वकील को समन भेजा जाएगा, तो यह निष्पक्ष न्याय प्रणाली को कमजोर कर सकता है।”
📌 सुप्रीम कोर्ट के सामने दो मुख्य सवाल
क्या किसी मामले में सिर्फ कानूनी सलाह देने वाले वकील को जांच एजेंसी समन भेज सकती है?
अगर एजेंसी को शक हो कि वकील की भूमिका केवल सलाह देने तक सीमित नहीं है, तो क्या बिना कोर्ट की अनुमति समन भेजा जाना उचित है?
⚖️ अब क्या होगा आगे?
कोर्ट ने इस मुद्दे को भारत के चीफ जस्टिस के पास भेजने का आदेश दिया है ताकि वे इसपर उचित बेंच गठित कर सकें। साथ ही, अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन, और एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन से इस विषय पर सहयोग मांगा गया है।
🧾 पिछले उदाहरण और विवाद
यह मामला तब और भी अहम हो जाता है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकीलों — अरविंद दातार और प्रताप वेणुगोपाल — को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा समन भेजे जाने को लेकर भी विवाद हुआ था। हालांकि, बाद में ED ने वह समन वापस ले लिया।